काश ये दिन भी न आता।
परम पूज्य छोटे गुरूजी का जन्म भूमि महाकाल नगरी उज्जैन हैं, यहाँ से हीं मेरे पूज्य गुरुओं का संगीत का अनंत यात्रा शुरू हुआ। उस पवन भूमि को स्पर्श करना और उस मिट्टी को अपने देह से लगाकर मिट्टी बन जाना ही सौभाग्य है। पर जो मेरे अंदर सदैब जीवित है उनको याद किस तरह करूँ ? उनके याद में अपने गायन समर्पित कैसे करूँ ? शायद ये मेरे जीवन का सबसे कठिन पल होगा। प्रिय छोटे गुरूजी आप थे, हैं और सदा हीं रहेंगे कंठ और नाशिका के उस अग्रभाग में जहाँ स्वर के अंतिम बिंदु दीखता है, ह्रदय और नाभि के गुरुगर्जन हुदक, गमक, लहक, धुरण, मुरण, स्पर्श और कंपित स्वरों में, स्वरों के बीच श्रुतिओं के अन्तराल में, शब्दों से परे निशब्द में जहाँ न में हूँ न और कोई जहाँ सिर्फ और सिर्फ आप हीं आप हैं।