मन

मन में
विचारों की माला
भबनाओं से गुंथ
अपनी चेतना खोई,
चेत से अचेत होये में
दिवस निशि रोई…।

शांत मन
है तपोवन
काहे कैलाश होई,
समय से जाग
छोड़ अनुराग
काहे रहत सोई।

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