मैंने देखा पृथ्वी को

मैंने देखा पृथ्वी को घूमते हुए
अपने ही उन्माद में पल पल झूमते हुए,
बादलों का बस्त्र पहने
अपने आपको सजते हुए..
मैंने देखा पृथ्वी को….

मैंने दिखा उसके बिशाल रूप को
अपनी दृष्टि को फैलाते हुए,
बादलों की खूबसूरती
सूरज की रौशनी से बदलते हुए…
मैंने देखा पृथ्वी को….

मैंने देखा
रात के अंधेरों में
उसको बात करते हुए,
चाँद तारों को
अपने करीब बुलाते हुए…
मैंने देखा पृथ्वी को….

बोल रहा था उनको
क्या आप सब मुझे अंदर से देख पाते हो…?
जीवन की अनंत यात्रा को
अपने हृदय में लिए चल पते हो…?
मेरे हृदय में बहुत कुछ बसा है,
क्या तुम्हें पता है,
क्या उनकी दशा है…?
उत्तर में वो बोल रहे हैं
तुम्हारा हृदय दूर दूर तक फैला है
जहाँ जीवन का एक अनंत मेला है…।
हम तो तुमसे दूर है,
न हम में जीवन है
न न होने का बिषाद है…।
खुश हैं,
हम तुम्हें ऐसे देखते हुए,
तुम गति को
कही और किसी के लिए न रुकाते हुए,
चलते चलो तुम
हम तुम्हारे साथ हैं…।

सुना मैंने उनको बात करते हुए,
आज देखा मैंने
पृथिवि को घूमते हुए….।

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