~मुकुंद देव साहू
मैं यह बाहरी दुनिया से
दूर रहना चाहता हूँ
अपनी अंतर दुनिया में
खोना चाहता हूँ….
शरीर में हो रही हलचल
कभी शांत कभी प्रबल
मन की गति को दुर्बल कर
निश्छल, स्वज्वल
देखना चाहता हूँ,
बाहरी दुनिया से….
विचारों की वृत्ति से क्रिया तक
यह कर्म चक्र को रोकना चाहता हूँ,
जन्म से मृत्यु की यात्रा को
अपने आप में समाना चाहता हूँ…
बाहरी दुनिया से…