चलो वहां चले
जहां से किरणे निकले,
न सुबह न शाम
प्रकृति की आंगन में
जो सदा जले ।।
न वस्तु हो,
न व्यक्ति हो,
राह अगर देख चुके हो,
चलते चलो फिर अकेले।।
चलो वहां चले…
~मुकुंद देव

Dhrupad, Music, Poetry, Prose, Article…
चलो वहां चले
जहां से किरणे निकले,
न सुबह न शाम
प्रकृति की आंगन में
जो सदा जले ।।
न वस्तु हो,
न व्यक्ति हो,
राह अगर देख चुके हो,
चलते चलो फिर अकेले।।
चलो वहां चले…
~मुकुंद देव
