By मुकुंद देव साहू
कर्म ऐसा है, जो सोने नहीं देता,
जन्मों से जन्मों तक,
मोक्ष होने नहीं देता।
कर्म ऐसा है, जो रोने नहीं देता,
सुख, समृद्धि, धन-मान,
स्वयं से दूर जाने नहीं देता।
कर्म ऐसा है, जो कभी
स्वयं से स्वयं को जुड़ने नहीं देता,
कर्म ऐसा है, जो कभी
संबंधों की डोरी को टूटने नहीं देता।
कर्म ऐसा है, जो भय और अनुताप से
जीवन जीने नहीं देता,
कर्म ऐसा है, जो सदाचारी को
कुछ होने नहीं देता।
कर्म ऐसा है, जो सारथी की तरह
प्रति क्षण संग चलता,
निर्धन-धनवान, बड़े-छोटे,
सबके लिए एक ही कहानी कहता।