नई घड़ी लेने से पहले
क्या वक़्त को भी देखोगे?
या केवल रंग-रूप से सजी
बाहरी सुंदरता ही परखोगे॥
जैसे दुनिया देखती आई है,
वैसे ही तुम भी देखोगे,
दीवार पर उसी जगह
उसे लगाने से पहले,
काँपते हाथों में एक डर होगा,
कहीं यह भी टूट न जाए,
बस यही सोचोगे॥
फिर उसी नई घड़ी के संग
हर पल वक़्त को निहारोगे,
बीती स्मृतियों के दुख लेकर
नए में भी पुराना अंदाज़ उतारोगे॥
पर सार यहीं समाप्त नहीं होता,
कहानी आगे भी चलती है,
जब टूटे हुए को भी
दीवार पर सजा दोगे,
पर थोड़ी-सी अंतर्दृष्टि से
उसे देख न पाओगे॥
वास्तव से दूर,
वक़्त के परिवर्तन को अनदेखा कर,
यह दिन, यह पल, यह वक़्त
कब बीत जाएँगे,
तुम जान भी न पाओगे॥