क्या मैंने नया लिखा है ?

~मुकुन्ददेव साहू

जन्म से जो देखा था
वही मैंने लिखा है।
क्या मैंने नया… ?

मैं तो बंजर जमीन था
उपजाऊ आपने बनाया है,
ना बीज आपका था
ना पेड़ भी मेरा है,
बताओ फिर यह लेख
किसने रचाया है?
क्या मैंने नया लिखा है ?

यह सब जानते हुए भी
“मैं” कहता है,
जानते हो!
आज मैंने कुछ नया लिखा है!!!

Translation

Have I written something new?

What I’ve seen since birth,
That’s what I’ve penned. Have I written something new?

I was a barren land,
Fertile, you’ve made me,
Neither the seed was yours,
Nor the tree mine,
Then tell me, this writing,
Who has composed it?
Have I written something new?

Knowing everything,
“I” still says,
You know!
Today, I’ve written something new!

Have I written something new?

खाली कुर्सी

खाली कुर्सी
जिसको मैंने अपनाया है,
जीवित रहते हुए मृत बन
उसके नीचे स्वयं को दफनाया है…
खाली कुर्सी
जिसको मैंने अपनाया है….

ख्वाबों की नगरी में
इसी कुर्सी को
माया के रंगों से सजाया है….
खाली कुर्सी
जिसको मैंने अपनाया है…..

कितने उसपर बैठे
फिर भी खुदको खाली पाया है…।।
खाली कुर्सी…..

गम

न जाने ये कैसा ग़म है,
सबकुछ रहते हुए भी
कुछ तो कम है,
बहुत कुछ में
जीवन बंट गया है,
यही अहसास ही
मन में हर-दम है।।
न जाने ये कैसा ग़म है….

कल समय की सीमाएं बहुत थी,
आज उसकी अवधि
मेरे उमर के लिए कम है,
गवाया हुआ समय को
याद रखा है,
पर,
उस समय के किरदार
आज गुमनाम है।।
न जाने ये कैसा ग़म है…..


Don’t know what kind of sorrow this is, despite being everything,
there is something less.
Life is divided into many things,
this is the feeling that it is always in the mind.
Don’t know what kind of sorrow this is……

Yesterday there was a lot of time limit
but today its duration is short for my age.
Has also remembered the time gone by but the character is anonymous today.
Don’t know what kind of sorrow this is……

Mukund Dev, Dhrupad Singer, Composer, Lyricist,Writer & Poet

http://www.mukunddev.com

अगर आपने कुछ बड़ा किआ है!

जब आपको ऐसा लगे की अपने बहुत बड़ा काम किया, आपके जैसा किसीने नहीं किया, केवल आपको इस महान कार्य का श्रेय जाना चाहिये, आपको शाबाशी मिलनी चाहिए, अपने बहुत दान किया है और आपको उन दान का पुण्य मिलना चाहिए, आप एक महान दान-वीर हो, आप के कार्य को सराहना मिलना आवश्यक है, आप उन महान महानुभावों में से हैं जिन्होंने बहुत कुछ किया है, आपके कार्य तारीफों के मोहोताज़ है, आपके जैसा कोई नही, कोई नही, कोई नही! तो सिर्फ एक बार अपने हृदय को खोलो दीवारों से बहार निकाल कर आसमान के नीचे, नंगे पाओं दो कदम मिट्टी को छूते, नदी के किनारे उस विशाल जल समुद्र के पास बैठ देखो, उस विशाल आकाश को जिस तत्व ने अपने बक्ष पर वायु को समेटे हुए पूरी सृष्टि के जीवन का आधार हुआ पर अपने आपको कभी बड़ा नही कहा, अपने नंगे पैरों से एक बार उस मिट्टी पर चलो और महसूस करो तुम्हारे जैसे पूरे सृष्टि का वजन को सम्भले हुए इस मिट्टी को जिसने कभी तुमसे तारीफ एक कतरा भी नही माँगी, कुछ पल के लिए अपने अंग वस्त्र उतारों और सूरज की उस रौशनी को अपने अंग से छुओ जिसने अग्नि तत्व से सृष्टि को बचाया पर किसी की अच्छाई या बुराई से जला नहीं, नदी के किनारे देखो उस विशाल जल राशि को जो सबकी तृष्णा निवारण कर रही पर तुम उसकी तृष्णा निवारण कभी किए ही नही। देखो इस विशाल प्रकृति को जिसने तुम्हारी प्रकृति को बचाया पर तुमने अपनी प्रकृति को जाना ही नहीं। आकाश ने कभी यह नही सोचा की किसको मैं अपनी गोद में स्थान दूँ और किसको नही, वायु ने कभी नही देखा की किस दिशा बहना है और किस दिशा में नहीं, जल ने कभी यह नही सोचा किसकी प्यास बुझाऊँ और किसकी नही, मिट्टी ने कभी यह नही देखा की कौन मेरा सीना भेद कर इमारत बना रहा और कौन कुटिया, प्रकृति ने कभी यह नही सोचा की कौन उसकी प्रकृति को समझ पाएगा या नही। उनको अपने कार्य पर कोई अंहकार नहीं, जो सिर्फ अपने कर्म निर्द्वन्द, निस्वार्थ और निर्विकार भाव से कर रहें हैं।

दान तो उस पांच तत्व का आप पर है जो आपके स्थूल शरीर का कारण है। पर इन तत्वों को अपने दान पर कोई अभिमान नही। अगर आप कभी दान करते हैं तो शायद उस पर आपका निहित स्वार्थ भी रह सकता है, जैसे की पुण्य प्राप्त करने की अभिलाषा। दान के तीन पर्याय होते है, जैसे की “तुच्छिक दान” करना ऐसे दान जो आपके कुछ अनावश्यक वस्तु या धन जो आपके उपयोग में नही आता है उसको आप जब दान करते हैं। दूसरे में “बत्सल्य दान”, ऐसे दान में आपका जो है उसको अपने लिए बचाते हुए दूसरों को दान देना। तीसरे में “आत्मिक दान”, यह दान में दानी प्रकृति के बराबर है जो पंच तत्व से बना यह स्थूल शरीर भी दान स्वरूप दे देता है।

आत्मिक दान का एक सुन्दर व्याख्यान भगवान बुद्ध के समय दिया गया है:

एक बार मगध के राजा अजातशत्रु ने भगवान बुद्ध को धर्म प्रचार के लिए देश आमंत्रित किया। भगवान बुद्ध के आने की खबर सारे देश में फैल गई। यह खबर जंगल में निवास एक दंपति के पास भी पहुँची। यह पति पत्नी (दंपति) बहुत गरीब थे जिनके पास पहेनने के लिए एक ही जोड़ी कपड़े थे। अगर पत्नी को बहार जाना हो तो पति घर में निबस्त्र हो रहते थे और पति को बहार जाना हो तो पत्नी। बुद्ध के धर्म वाणी सुनने के लिए दोनों ही उत्सुक थे और संशय में भी। समस्या यह थी कि दोनों के पास एक जोड़ी कपड़े है जाए तो कौन जाए। दोनों ही अपने अभाबी जीवन को तिरस्कार कर दुःख और पीड़ा से जर्जरित थे। अंत में पतिब्रता पत्नी ने अपने पति को जाने की गुहार की और वे घर पर रही। पति बुद्ध के धर्म वाणी सुनने पहुँच धर्म की गहराई को सुनते सुनते ही समाधीवश हो गया। समाधी से जगते ही अपने अंतर से दान चेतना जागृत हुई तो अपने बस्त्र को दान देंगे यह निर्धारित किया। पर यह चेतना आते ही वो संशय में भी पड़ गया की अगर यह एक ही बस्त्र अगर वो दान कर देता है तो उनकी लज्जा निवारण कैसे होगा? फिर उनके विचारों में द्वन्द शुरू हुआ और कुछ देर ऐसे द्वन्द में रहे फिर अचानक वो धर्म सभा में खड़ा हो कर बोलने लगा की मैं जीत गया, मैं जीत गया!! और अपने बस्त्र दान देने के लिए उत्छुक हो आगे बढ़ ही रहे थे तो यह देखते ही भगवान बुद्ध को सारा बृतान्त पता चल गया और वह वस्त्र दान देने से पहले ही सारे बात अजातशत्रु को बता दी। अजातशत्रु ने उस भक्त को 32 जोड़ी कपड़े दान स्वरूप भेट दिए। पर दान धर्म की गहराई से परिचित हो व्यक्ति ने अपने लिए और पत्नी के लिए दो जोड़ी कपड़ा रख कर और सारे 30 कपड़े भगवान बुद्ध को दान स्वरूप भेट दिए। आत्मिक दान सदैब निस्वार्थपर और निर्विकार होता है यह उसका उत्कृष्ट उदहारण है।

इन दानीओं में से आप कौन से हैं? सोचिये और देखिये। कोई कोई दान किसको करें, क्या करें और कैसे करें ? यह सोचते सोचते अपने जीवन के अंतिम चरण में ही पहुँच जाते हैं। पर दान के धर्म को नहीं समझ पाते। उनको पात्र-अ-पात्र, दरिद्र-अदरिद्र, अच्छे-बुरे, शत्रु-मित्र, जैसी शंकाएं दान के पथ को अबरोध कर रखती है। जैसे प्रकृति ने दान करते वक़्त यह कुछ भी देखा नहीं सबके लिए करुणा और प्रेम से अपना मानकर गुण धर्म को दान दिया। आपको उनसे क्या सीखना चाहिए ? सोचिये और देखिये। बस देखो और सिखों। यहाँ कोई सिखाने वाला नहीं या कोई दिखने वाला नहीं, कोई सुनने और सुनाने वाला नहीं सिर्फ तुम ही तुम हो। और कितने दिन अपने पथ पर आप ही खड़े रहोगे। कभी भी अनंत निद्रा हो सकती है बस उस निद्रा में स्थूल शरीर का ही त्याग होगा पर आपका कर्म ही जीवित रहेगा। इस नाटक का अंत निस्वार्थ कर्म से हो जहाँ तुम और मैं कोई न हो सिर्फ धर्म ही धर्म हो।