ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ

Mukund Dev Sahoo

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ
ଜନ୍ମ-ଜରା-ମୃତ୍ୟୁ ଏହି କ୍ରମେ,
ଅନିଶ୍ଚିତ ଜୀବନର ଚକ୍ରେ
ଶାନ୍ତି ପାଈଁ ଜପ-ତପ-ଧାମେ।
ମୋତେ ଆଉ……

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ
ଈଶ୍ୱରଙ୍କ ଶହ ଶହ ନାମେ,
ନିଜ ସହ ନିଜେ ଯୋଡ଼ି ନାହିଁ
ବାନ୍ଧି ହେବି କାହିଁ ଏତେ ଧର୍ମେ।
ମୋତେ ଆଉ…….

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ
ସୁଖୀ ହେବା କଠୋର ନିୟମେ,
ଦୁଃଖ ଘରେ ଘର ମୁଁ ତୋଳିଛି
ମାୟା ଜାଲେ ନିତି ଦିନ ଝୁମେ।
ମୋତେ ଆଉ….

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ
ମୃତ୍ୟୁ ଯୁଦ୍ଧେ ପରାଜୟ ଭ୍ରମେ,
ଜନ୍ମ ପରେ ମୃତ୍ୟୁ ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧି
ଡରକୁ ମୁଁ ହରାଇଛି ପ୍ରେମେ।
ମୋତେ ଆଉ…
◆◆◆

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बस चल रहा है -2

बस चल रहा है
जीवन की नॉका मैं
शारीर सबार है,
किनारे से निकले थे
किनारे की तलाश है,
बस चल रहा है…

सोचा था
सागर बहुत छोटा है,
वही तक फैला है
जहाँ बादल झुका है,
जितने भी करीब आऊ
वो बैसे दीखता है,
मेरे नज़र के साथ
ये कैसी धोखा है,
बस चल रहा है….

सीखो

फूल हो तो काटें पर चलना सीखो,
सूरज हो तो ढलना सीखो,
चाँद हो अंधेरे में खोना सीखो,
बादल हो तो बरसाना सीखो,
आग हो तो राख सीखो,
पानी हो तो प्यास बुझाना सीखो,
मिट्टी हो तो सहना सीखो,
बायु हो तो बहाना सीखो,
नदी हो तो समुन्दर में मिलना सीखो,
लहर हो तो किनारे लगना सीखो,
जन्मे हो तो मरना सीखो,
जिंदगी एक सिख है
जबतक जीओगे तबतक सीखो।।।
★★■★★

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क्या जवाब दूँ ?

मैं तो
बहती नदी के धार को
ढलते हुए सूरज के
बुझती हुई रौशनी को,
चार पैरो वाली
कंपकपाती बृद्धा को,
रोग में पीड़ित अछूतों को,
बहती पवन के स्पर्श को,
देख चुका हूँ करीब से ।।

खुद को साबित करने के लिए
क्या जवाब दूँ उस रौशनी को
जो ढल चुकी है,
उस हवाओं को
जो वह चुकी है,
वो नदी की धार
जो समुन्दर में
समां चुकी है..

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तृप्त नहीं “मैं”

“I”Ego

तृप्त नहीं “मैं”
कर्म की यात्रा से
मुक्त नहीं “मैं”,
अहम घड़ी भर चुकी है,
फिर भी,
इच्छा, कामना से
ज्ञात नहीं “मैं”….
तृप्त नहीं “मैं”…..।।

गुप्त है
पर लुप्त नहीं “मैं”
सुषुप्त चित्त में
शक्त रहा “मैं”
व्यक्तित्व के वस्त्र में
व्यक्ति है,
तत्व नहीं “मैं”….।।

ଅଳପରେ ଗଳପ

ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ ସାହୁ

ଅଳପ ରେ ଗଳପ କାହିଁ ଏତେ ବିଳାପ
ଦେଖ କରି ସ୍ଵଳପ ଜୀବନର ମିଳାପ…!!

ଜୀବନ ତ ଧାଇଁନି କାହା ବାଟ ଚାହିଁନି
ନିରନ୍ତର ଚାଲିଛି କାହା ପାଈଁ ରହିନି…!!

ଏ ଜୀବନ ଧରମ କରୁଅଛି କରମ
ମୃତୁ ପରେ ଜନମ ଜୀବନର ମରମ….!!

ଜୀବନରେ ମନଟା ସ୍ୱାଭିମାନ ଧନ ଟା
ବିବେକକୁ ଭୁଲିଛି କାଟୁଅଛି ଦିନଟା…!!

ମନର ଯେ ପ୍ରଭାବ ଜାଣିବାଟା ଦୁର୍ଲଭ
ରାଗ, ଦ୍ବେସ, ଦୁଃଖରେ ଶାନ୍ତ ତାର ସ୍ଵଭାଵ…!!

ମନକୁ ଯେ ଜାଣିଛି ଜୀବନକୁ ଯିଣିଛି
ମନ ନିରବତାରେ ଈଶ୍ୱରଙ୍କୁ ଦେଖିଛି….!!

ଗଳପର ସମାପ୍ତି ମନଯୋଗେ ମିଳନ୍ତି
ଜୀବନର ଆନନ୍ଦ ଅନୁଭବ କରନ୍ତି…!!

मैंने देखा पृथ्वी को

मैंने देखा पृथ्वी को घूमते हुए
अपने ही उन्माद में पल पल झूमते हुए,
बादलों का बस्त्र पहने
अपने आपको सजते हुए..
मैंने देखा पृथ्वी को….

मैंने दिखा उसके बिशाल रूप को
अपनी दृष्टि को फैलाते हुए,
बादलों की खूबसूरती
सूरज की रौशनी से बदलते हुए…
मैंने देखा पृथ्वी को….

मैंने देखा
रात के अंधेरों में
उसको बात करते हुए,
चाँद तारों को
अपने करीब बुलाते हुए…
मैंने देखा पृथ्वी को….

बोल रहा था उनको
क्या आप सब मुझे अंदर से देख पाते हो…?
जीवन की अनंत यात्रा को
अपने हृदय में लिए चल पते हो…?
मेरे हृदय में बहुत कुछ बसा है,
क्या तुम्हें पता है,
क्या उनकी दशा है…?
उत्तर में वो बोल रहे हैं
तुम्हारा हृदय दूर दूर तक फैला है
जहाँ जीवन का एक अनंत मेला है…।
हम तो तुमसे दूर है,
न हम में जीवन है
न न होने का बिषाद है…।
खुश हैं,
हम तुम्हें ऐसे देखते हुए,
तुम गति को
कही और किसी के लिए न रुकाते हुए,
चलते चलो तुम
हम तुम्हारे साथ हैं…।

सुना मैंने उनको बात करते हुए,
आज देखा मैंने
पृथिवि को घूमते हुए….।

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बस चल रहा है

न तेरा है न मेरा है
फिर भी ख़रीददारी चल रही है,
न तेरा है न मेरा है
फिर भी धोखादारी चल रही है,
न तेरा है न मेरा है
फिर भी मारा-मारी चल रही है…

बस चल रहा है,
जीवन का यह निर्बाह
न है संवाद
न है कोई उत्साह,
न सत्य से पहचान
न कोई खोज,
घट रही वही कहानी
हर रोज…

बस चल रहा है,
जीवन का एक झूठा नाटक,
किसी के झुठेपन से
खुल और बंद हो रहा
जीवन का अनखुला फाटक…

बस चल रहा है,
किसीने कुछ कहा
बिन सुने उसको सुना
बिन देखे उसको देखा,
खुद को उनमें समाया
और खुद को खुद से ही रोका….

बस चल रहा है,
नित्य कर्म
जो अनित्य से जुड़ा है,
कितनों की ख़ुशी के लिए
खुद-को कहीं दूर छोड़ा है….

बस चल रहा है
जीवन की नॉका मैं
शारीर सबार है,
किनारे से निकले थे
किनारे की तलाश है,
बस चल रहा है…

सोचा था
सागर बहुत छोटा है,
वही तक फैला है
जहाँ बादल झुका है,
जितने भी करीब आऊ
वो बैसे दीखता है,
मेरे नज़र के साथ
ये कैसी धोखा है,
बस चल रहा है….

क्या पता यह शरीर
कब मुझसे नाता तोड़ दे,
बस तोड़ने से पहले
अपने आप से नाता जोड़ दे,
ढूंढ लूँ अपने आपको आप में
फिर सभी से नाता तोड़ दे
फिर सभी से….

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