କର୍ମ

ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ ସହୁ

ଧର୍ମରେ ଚାଲିଛୁ କର୍ମବୀର ହୋଇ
ମର୍ମଟା ଅଛି କି ନାହିଁ?
ସତ୍ୟ-ଦୟା-କ୍ଷମା ସମ୍ବେଦନା ନେଇ
କର୍ମିକୁ ଦେଖିନେ ରହି…।।

କହିବା ଆଗରୁ ନକହି ଟିକିଏ
ଦେଖିନେ ଶବ୍ଦକୁ ତୁହି,
କହିବାର ଯଦି ନଥିବ ତାହାକୁ
ରଖିଦେ ଅନ୍ତରେ ନେଇ…।।

ନିଶବ୍ଦ ଶବ୍ଦଟି ଭରି ସୁଆଦିଆ
ଚାଖିନେ ନିରବ ହୋଇ,
ଶବ୍ଦରେ ସୁଅରେ ଜୀବନ ଭାସୁନି
ଦେଖ ଜ୍ଞାନ ଚକ୍ଷୁ ଫେଈ…।।

କର୍ମ ମାନେ ନୁହଁ ଅର୍ଥ ଉପାର୍ଜନ
ଖାଲି ପେଟ ପୁଜା ପାଈଁ,
ଦିନ ରାତି ଯାହା ଘଟୁଛି ତୁମଠି
କ୍ଷଣେ କ୍ଷଣେ କର୍ମ ଦାୟୀ…।।

ଲୋଭ-କ୍ରୋଧ-ମୋହ ଧରି ତୁ ଆସିନୁ
ଜନ୍ମଠୁଁ ତୋ ସାଥେ ନାହିଁ,
ଶରୀର ମନର ଧର୍ମ କୁ ଜାଣିଲେ
ଧର୍ମ କର୍ମ ହେବ ସେଇ…।।

କର୍ମକୁ ସାରଥୀ କରି ଚାଲ ତୁହି
ତା ପରି ଗୁରୁ କେ ନହିଁ,
ଏ ଜୀବନ ଶିଷ୍ୟ ହୋଇ କଟିଯିବ
ମୁକତି ପଥଟି ସେଇ…।।

ମୃତ୍ଯୁର ବସ୍ତ୍ରରେ… (Clothed in death)

By Mukund Dev Sahoo

ମୃତ୍ଯୁର ବସ୍ତ୍ରରେ ଜନ୍ମିତ ମୁଁ
ଜନ୍ମଠୁ ଭ୍ରମରେ ଭ୍ରମିତ ମୁଁ,
କେହି ମୋତେ ଏଠି ଜାବୁଡ଼ି ଧରିନି
ପର ସାଥେ ନିଜ ସତ୍ତାଟେ ମୁଁ,
ମୃତ୍ୟୁର ବସ୍ତ୍ରରେ…..।।

ସମ୍ବେଦନା ନାହିଁ
ଏଠି କାହା ପାଈଁ
ବିବାଦିତ ଅହଂ କର୍ତାଟେ ମୁଁ,
ମୁଁ ଠାରୁ ମୁଁ ଅଲଗା ହୋଇନି
ଲାଂଛିତ ହେଲେବି ରଞ୍ଜିତ ମୁଁ..
ମୃତ୍ୟୁର ବସ୍ତ୍ରରେ…..।।

ବସ୍ତୁ ଠାରୁ ବ୍ୟକ୍ତି ମହଙ୍ଗା ଲାଗୁଛି
ବ୍ୟକ୍ତିତ୍ୱ ସତ୍ତାରେ ଅନ୍ଧଟେ ମୁଁ,
ନିଜ କଥା କେବେ ନିଜେ ବୁଝି ନାହିଁ
ପର ସଂସ୍କାରର ଆକାର ମୁଁ…
ମୃତ୍ୟୁର ବସ୍ତ୍ରରେ…..।।

ମରଣ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଦେଖିବି ଅଦେଖା
ଅନ୍ତର ନେତ୍ରଠୁଁ ବାହାରେ ମୁଁ,
ମୋର ଏ ଜୀବନ ମର ହୋଇଯିବ
ମୁଁ ସତ୍ତା ନେଇ ଜନ୍ମିବି ମୁଁ,
ମୃତ୍ୟୁର ବସ୍ତ୍ରରେ….।।

“I” am born in the clothes of death
That “I” has been in illusion since birth
No one is holding “me”
There is a doer “I” with others.

Really don’t have sympathy for whom,
The “I” matters in the dispute,
I am not different from “I”,
“I” is colored even after slander.

The person looks more expensive than the things,
The “I” is blinded by the power of personality,
I never understood “I”
“I” is the shape of others’ cultivation.

Ignored even after seeing the agony of death,
The “I” is out of the inner eye,
This life of “I” will become dead,
“I” will be born again from the power of “I”.

http://www.mukunddev.com

http://www.dhrupadmusicfoundation.com

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ

Mukund Dev Sahoo

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ
ଜନ୍ମ-ଜରା-ମୃତ୍ୟୁ ଏହି କ୍ରମେ,
ଅନିଶ୍ଚିତ ଜୀବନର ଚକ୍ରେ
ଶାନ୍ତି ପାଈଁ ଜପ-ତପ-ଧାମେ।
ମୋତେ ଆଉ……

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ
ଈଶ୍ୱରଙ୍କ ଶହ ଶହ ନାମେ,
ନିଜ ସହ ନିଜେ ଯୋଡ଼ି ନାହିଁ
ବାନ୍ଧି ହେବି କାହିଁ ଏତେ ଧର୍ମେ।
ମୋତେ ଆଉ…….

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ
ସୁଖୀ ହେବା କଠୋର ନିୟମେ,
ଦୁଃଖ ଘରେ ଘର ମୁଁ ତୋଳିଛି
ମାୟା ଜାଲେ ନିତି ଦିନ ଝୁମେ।
ମୋତେ ଆଉ….

ମୋତେ ଆଉ ଡରାଅନି ତୁମେ
ମୃତ୍ୟୁ ଯୁଦ୍ଧେ ପରାଜୟ ଭ୍ରମେ,
ଜନ୍ମ ପରେ ମୃତ୍ୟୁ ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧି
ଡରକୁ ମୁଁ ହରାଇଛି ପ୍ରେମେ।
ମୋତେ ଆଉ…
◆◆◆

http://www.mukunddev.com

बस चल रहा है -2

बस चल रहा है
जीवन की नॉका मैं
शारीर सबार है,
किनारे से निकले थे
किनारे की तलाश है,
बस चल रहा है…

सोचा था
सागर बहुत छोटा है,
वही तक फैला है
जहाँ बादल झुका है,
जितने भी करीब आऊ
वो बैसे दीखता है,
मेरे नज़र के साथ
ये कैसी धोखा है,
बस चल रहा है….

अगर आपने कुछ बड़ा किआ है!

जब आपको ऐसा लगे की अपने बहुत बड़ा काम किया, आपके जैसा किसीने नहीं किया, केवल आपको इस महान कार्य का श्रेय जाना चाहिये, आपको शाबाशी मिलनी चाहिए, अपने बहुत दान किया है और आपको उन दान का पुण्य मिलना चाहिए, आप एक महान दान-वीर हो, आप के कार्य को सराहना मिलना आवश्यक है, आप उन महान महानुभावों में से हैं जिन्होंने बहुत कुछ किया है, आपके कार्य तारीफों के मोहोताज़ है, आपके जैसा कोई नही, कोई नही, कोई नही! तो सिर्फ एक बार अपने हृदय को खोलो दीवारों से बहार निकाल कर आसमान के नीचे, नंगे पाओं दो कदम मिट्टी को छूते, नदी के किनारे उस विशाल जल समुद्र के पास बैठ देखो, उस विशाल आकाश को जिस तत्व ने अपने बक्ष पर वायु को समेटे हुए पूरी सृष्टि के जीवन का आधार हुआ पर अपने आपको कभी बड़ा नही कहा, अपने नंगे पैरों से एक बार उस मिट्टी पर चलो और महसूस करो तुम्हारे जैसे पूरे सृष्टि का वजन को सम्भले हुए इस मिट्टी को जिसने कभी तुमसे तारीफ एक कतरा भी नही माँगी, कुछ पल के लिए अपने अंग वस्त्र उतारों और सूरज की उस रौशनी को अपने अंग से छुओ जिसने अग्नि तत्व से सृष्टि को बचाया पर किसी की अच्छाई या बुराई से जला नहीं, नदी के किनारे देखो उस विशाल जल राशि को जो सबकी तृष्णा निवारण कर रही पर तुम उसकी तृष्णा निवारण कभी किए ही नही। देखो इस विशाल प्रकृति को जिसने तुम्हारी प्रकृति को बचाया पर तुमने अपनी प्रकृति को जाना ही नहीं। आकाश ने कभी यह नही सोचा की किसको मैं अपनी गोद में स्थान दूँ और किसको नही, वायु ने कभी नही देखा की किस दिशा बहना है और किस दिशा में नहीं, जल ने कभी यह नही सोचा किसकी प्यास बुझाऊँ और किसकी नही, मिट्टी ने कभी यह नही देखा की कौन मेरा सीना भेद कर इमारत बना रहा और कौन कुटिया, प्रकृति ने कभी यह नही सोचा की कौन उसकी प्रकृति को समझ पाएगा या नही। उनको अपने कार्य पर कोई अंहकार नहीं, जो सिर्फ अपने कर्म निर्द्वन्द, निस्वार्थ और निर्विकार भाव से कर रहें हैं।

दान तो उस पांच तत्व का आप पर है जो आपके स्थूल शरीर का कारण है। पर इन तत्वों को अपने दान पर कोई अभिमान नही। अगर आप कभी दान करते हैं तो शायद उस पर आपका निहित स्वार्थ भी रह सकता है, जैसे की पुण्य प्राप्त करने की अभिलाषा। दान के तीन पर्याय होते है, जैसे की “तुच्छिक दान” करना ऐसे दान जो आपके कुछ अनावश्यक वस्तु या धन जो आपके उपयोग में नही आता है उसको आप जब दान करते हैं। दूसरे में “बत्सल्य दान”, ऐसे दान में आपका जो है उसको अपने लिए बचाते हुए दूसरों को दान देना। तीसरे में “आत्मिक दान”, यह दान में दानी प्रकृति के बराबर है जो पंच तत्व से बना यह स्थूल शरीर भी दान स्वरूप दे देता है।

आत्मिक दान का एक सुन्दर व्याख्यान भगवान बुद्ध के समय दिया गया है:

एक बार मगध के राजा अजातशत्रु ने भगवान बुद्ध को धर्म प्रचार के लिए देश आमंत्रित किया। भगवान बुद्ध के आने की खबर सारे देश में फैल गई। यह खबर जंगल में निवास एक दंपति के पास भी पहुँची। यह पति पत्नी (दंपति) बहुत गरीब थे जिनके पास पहेनने के लिए एक ही जोड़ी कपड़े थे। अगर पत्नी को बहार जाना हो तो पति घर में निबस्त्र हो रहते थे और पति को बहार जाना हो तो पत्नी। बुद्ध के धर्म वाणी सुनने के लिए दोनों ही उत्सुक थे और संशय में भी। समस्या यह थी कि दोनों के पास एक जोड़ी कपड़े है जाए तो कौन जाए। दोनों ही अपने अभाबी जीवन को तिरस्कार कर दुःख और पीड़ा से जर्जरित थे। अंत में पतिब्रता पत्नी ने अपने पति को जाने की गुहार की और वे घर पर रही। पति बुद्ध के धर्म वाणी सुनने पहुँच धर्म की गहराई को सुनते सुनते ही समाधीवश हो गया। समाधी से जगते ही अपने अंतर से दान चेतना जागृत हुई तो अपने बस्त्र को दान देंगे यह निर्धारित किया। पर यह चेतना आते ही वो संशय में भी पड़ गया की अगर यह एक ही बस्त्र अगर वो दान कर देता है तो उनकी लज्जा निवारण कैसे होगा? फिर उनके विचारों में द्वन्द शुरू हुआ और कुछ देर ऐसे द्वन्द में रहे फिर अचानक वो धर्म सभा में खड़ा हो कर बोलने लगा की मैं जीत गया, मैं जीत गया!! और अपने बस्त्र दान देने के लिए उत्छुक हो आगे बढ़ ही रहे थे तो यह देखते ही भगवान बुद्ध को सारा बृतान्त पता चल गया और वह वस्त्र दान देने से पहले ही सारे बात अजातशत्रु को बता दी। अजातशत्रु ने उस भक्त को 32 जोड़ी कपड़े दान स्वरूप भेट दिए। पर दान धर्म की गहराई से परिचित हो व्यक्ति ने अपने लिए और पत्नी के लिए दो जोड़ी कपड़ा रख कर और सारे 30 कपड़े भगवान बुद्ध को दान स्वरूप भेट दिए। आत्मिक दान सदैब निस्वार्थपर और निर्विकार होता है यह उसका उत्कृष्ट उदहारण है।

इन दानीओं में से आप कौन से हैं? सोचिये और देखिये। कोई कोई दान किसको करें, क्या करें और कैसे करें ? यह सोचते सोचते अपने जीवन के अंतिम चरण में ही पहुँच जाते हैं। पर दान के धर्म को नहीं समझ पाते। उनको पात्र-अ-पात्र, दरिद्र-अदरिद्र, अच्छे-बुरे, शत्रु-मित्र, जैसी शंकाएं दान के पथ को अबरोध कर रखती है। जैसे प्रकृति ने दान करते वक़्त यह कुछ भी देखा नहीं सबके लिए करुणा और प्रेम से अपना मानकर गुण धर्म को दान दिया। आपको उनसे क्या सीखना चाहिए ? सोचिये और देखिये। बस देखो और सिखों। यहाँ कोई सिखाने वाला नहीं या कोई दिखने वाला नहीं, कोई सुनने और सुनाने वाला नहीं सिर्फ तुम ही तुम हो। और कितने दिन अपने पथ पर आप ही खड़े रहोगे। कभी भी अनंत निद्रा हो सकती है बस उस निद्रा में स्थूल शरीर का ही त्याग होगा पर आपका कर्म ही जीवित रहेगा। इस नाटक का अंत निस्वार्थ कर्म से हो जहाँ तुम और मैं कोई न हो सिर्फ धर्म ही धर्म हो।

सीखो

फूल हो तो काटें पर चलना सीखो,
सूरज हो तो ढलना सीखो,
चाँद हो अंधेरे में खोना सीखो,
बादल हो तो बरसाना सीखो,
आग हो तो राख सीखो,
पानी हो तो प्यास बुझाना सीखो,
मिट्टी हो तो सहना सीखो,
बायु हो तो बहाना सीखो,
नदी हो तो समुन्दर में मिलना सीखो,
लहर हो तो किनारे लगना सीखो,
जन्मे हो तो मरना सीखो,
जिंदगी एक सिख है
जबतक जीओगे तबतक सीखो।।।
★★■★★

http://www.mukunddev.com

क्या जवाब दूँ ?

मैं तो
बहती नदी के धार को
ढलते हुए सूरज के
बुझती हुई रौशनी को,
चार पैरो वाली
कंपकपाती बृद्धा को,
रोग में पीड़ित अछूतों को,
बहती पवन के स्पर्श को,
देख चुका हूँ करीब से ।।

खुद को साबित करने के लिए
क्या जवाब दूँ उस रौशनी को
जो ढल चुकी है,
उस हवाओं को
जो वह चुकी है,
वो नदी की धार
जो समुन्दर में
समां चुकी है..

http://www.mukunddev.com

तृप्त नहीं “मैं”

“I”Ego

तृप्त नहीं “मैं”
कर्म की यात्रा से
मुक्त नहीं “मैं”,
अहम घड़ी भर चुकी है,
फिर भी,
इच्छा, कामना से
ज्ञात नहीं “मैं”….
तृप्त नहीं “मैं”…..।।

गुप्त है
पर लुप्त नहीं “मैं”
सुषुप्त चित्त में
शक्त रहा “मैं”
व्यक्तित्व के वस्त्र में
व्यक्ति है,
तत्व नहीं “मैं”….।।