कर दान गुनी को
गुनी गुन जानी को,
गुन का मान रखिए
पूजन कर मुनी को ॥
गुनी गुन दाता है,
मुनी समान आता है,
ना करो मान गुनी की
ज्ञान चला जाता है ॥
~मुकुंद देव
२७/१२/२०२० 09:59PM
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कर दान गुनी को
गुनी गुन जानी को,
गुन का मान रखिए
पूजन कर मुनी को ॥
गुनी गुन दाता है,
मुनी समान आता है,
ना करो मान गुनी की
ज्ञान चला जाता है ॥
~मुकुंद देव
२७/१२/२०२० 09:59PM
ढलता हुआ सूरज बहुत जल्दी ढलता है,
उसका सफ़र आपको न मुझे पता है।
कारनामा सुराजका
ढालने के बाद पता चलता है।
ढलता हुआ सूरज……!!
सुबह से सफर शुरू हुआ था
पता नहीँ वो शुबह कौनसा था,
घड़ी घड़ी सबको रोशन किया था,
अँधेरों का अनदेखा साया
उजालों की लोरी सुनाता हैं।
ढलता हुआ सूरज…..!!
~मुकुंद देव
१०/१२/२०१९ १६:३६PM
ନା ଅର୍ଥ ଅଛି ନା ସ୍ୱାର୍ଥ ଅଛି
ବ୍ୟର୍ଥତା ସଂପର୍କେ ଗହଣା ସାଜିଛି..।।
ନା ଆଶା ଅଛି ନା ଦିଶା ଅଛି
ନିରାଶାରେ ପ୍ରାଣ ଅଟକି ଯାଇଛି…।।
ନା ଉର୍ଜା ଅଛି ନା ରଶ୍ମି ଅଛି
ଅହଂ ଧୂଆଁରେ ସବୁ ଝାପସା ଦିଶୁଛି…।।
ନା ଧର୍ମ ଅଛି ନା କର୍ମ ଅଛି
ନିଜର ମର୍ମକୁ ଦୂରେଇ ଦେଇଛି..।।
ନା ତୁ ଅଛି ନା ମୁଁ ଅଛି
କିନ୍ତୁ, ମୁଁ ତୁ ରେ ସବୁ ଅଟକି ଯାଇଛି…।।
Nov 14th 2019 23:53pm
ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ
ଦିନ ବିତି ଗଲା ରାତ୍ରି ଆଗମନେ
ଏବେବି ପଡୁଛ ମାନେ
ତୁମ ସଂଗେ ବିତା ସମୟକୁ ମୁଁ
ଦେଖୁଅଛି ଦିବା ସ୍ୱପ୍ନେ…..।।
ପଲକ ପଡୁନି ଝଲକ ତୁମେ
ପୁଲକିତ ମର୍ମେ ମର୍ମେ
ପ୍ରୀତି ନୟନରେ ପ୍ରେମର ଇଙ୍ଗିତ
ଦୃଶ୍ୟମାନ କୋଣେ କୋଣେ….।।
समय समय से बह
रहा है,
पर, आपके साथ बीता समय
ठहर गया है….।
न जाने किस डोर में बंधे हेैं
जो नहीं हैं वह दोहरा रहा हैं….।
समय समय से……!!
समय हैं पर मेैं नहीं हूँ
समय से दूर और कहीं हूँ…..।
वह समय भी समय ही था
जो अब भी मुझमें गुज़र रहा हैं…..।
समय समय……!!
१६/०९/२०१९
~मुकुंद देव
सुन फिर सुनना
ये हे जिंदिगी, नही है खिलौना
जो मैंने देखा
और सुना भी
वो नही है जमाना।।
सुन फिर……
किसने पैदा किया है
कैसे सब हुआ है
अनसुलझी गुट्टी है
इसमें न उलझना
सुन फिर…।।
१५/१०/२०१९
मुकुंद देव
कौन कहता है ?
वह मुझमें बसे हैं
इसलिए सब मुझपर हँसे है…।।
कौन कहता है ?
मेरे लिए वह कभी
बोहत रोये है,
और मेरे लिए
ना जगे ना सोये हैं…।।
कौन कहता है ?
मेैं उनमें और वह मुझेमें हैं
उनको मुझसे अटूट प्रेम हैं,
वह मेरे लिए जिए हैं
मेरी याद में पल पल मरे हैं,
यह कौन कहता है ?
किसी ने ठीक कहा है !
न वहाँ काया न कोई छाया हैं
हम सब किसी माया में डूबे हैं…।
न वह मुझमें न मेैं उनमें
पर किसीना किसी धुन में रमे है…।।
यह भी कौन कहता है ?
~मुकुंद देव (०८:४५ pm २८/०८/२०१९)
ଘାତ ପ୍ରତିଘାତ ଆଘାତ କୁ ସହି
ଆସିଛି ଏ ସ୍ୱର ଅନନ୍ତ ରୁ ବହି,
ସ୍ଥିର ଆବରଣେ ଅସ୍ଥିର ସ୍ୱର ଏ
ଗତି ତାର ଧୀର ବହେ ରହି ରହି।
ଆସିଛି ଏ ସ୍ୱର……….।।
ସମ୍ବାଦ ମୋ ସଂଗେ ବିବାଦ କରଇ
ଅସ୍ଥିର ଲହରୀ ମନେ ମୋ ଖେଳାଇ,
ସ୍ଥିରତା ଆଜି ମୋ ମନର କଳ୍ପନା
ନାଦ ନିରନ୍ତତା ଖୋଜି ପାଉନାହିଁ।
ଆସିଛି ଏ ସ୍ୱର……… ।।
ଖୋଜି ଖୋଜି କେବେ ହଜି ଯାଉଅଛି
ନିଜ ମଧ୍ୟେ ନିଜେ ମଜ୍ଜି ଯାଉଅଛି,
ଅନନ୍ତ ନାଦର ଅନାଦି ସ୍ୱର ରେ
ଅନ୍ତର ଆତ୍ମା ମୋ ଭିଜି ଯାଉଅଛି।
ଆସିଛି ଏ ସ୍ୱର……..।।
କେବେ ଜ୍ୟୋତି ହୋଇ ମତି ହରାଉଛି
ଘନ ଅନ୍ଧାରରେ ଆଲୁଅ ସାଜିଛି,
ରଙ୍ଗ,ରୂପ,ଗନ୍ଧ ନଥାଇ କିଛି ବି
ଐଶର୍ୟ ଭାବେ ଯାଉଅଛି ଗାଇ।
ଆସିଛି ଏ ସ୍ୱର………।।
୨୪/୦୮/୨୦୧୯
ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ
କାଳର ରୂପ ଯେ ବିଶାଳ
କାଳ ନହିଲେ ସେ ଅକାଳ,
କାଳର କଳାରେ କଳାୟିତ ଯିଏ,
କାଳ ତା ପାଈଁ ସକାଳ।
କାଳ ପରି ମନ ଚଞ୍ଚଳ
ଦୁହିଁଙ୍କର ଗତି ପ୍ରବଳ
କାଳ ସଂଗେ ମନ ତାଳ ମେଳ ଥିଲେ
ଜୀବନ ହୋଇବ ନିଶ୍ଚଳ।
2:46PM 27/05/2019
काश ये दिन भी न आता।
परम पूज्य छोटे गुरूजी का जन्म भूमि महाकाल नगरी उज्जैन हैं, यहाँ से हीं मेरे पूज्य गुरुओं का संगीत का अनंत यात्रा शुरू हुआ। उस पवन भूमि को स्पर्श करना और उस मिट्टी को अपने देह से लगाकर मिट्टी बन जाना ही सौभाग्य है। पर जो मेरे अंदर सदैब जीवित है उनको याद किस तरह करूँ ? उनके याद में अपने गायन समर्पित कैसे करूँ ? शायद ये मेरे जीवन का सबसे कठिन पल होगा। प्रिय छोटे गुरूजी आप थे, हैं और सदा हीं रहेंगे कंठ और नाशिका के उस अग्रभाग में जहाँ स्वर के अंतिम बिंदु दीखता है, ह्रदय और नाभि के गुरुगर्जन हुदक, गमक, लहक, धुरण, मुरण, स्पर्श और कंपित स्वरों में, स्वरों के बीच श्रुतिओं के अन्तराल में, शब्दों से परे निशब्द में जहाँ न में हूँ न और कोई जहाँ सिर्फ और सिर्फ आप हीं आप हैं।