Knowledge unfolds by itself

A calf of a cow is born and goes to its mother and starts drinking milk on its own. Mother never taught him or never showed him how to drink milk but he went and started drinking on his own, neither he did chanting nor Tapa nor did he take the help of other people.

We humans only say that we humans are the greatest scholars, the most knowledgeable, the most great. And we also need the most security, from everybody. And we are great. Whatever we are chanting, someone made it, we did not even see it and someone told us that this chanting will help us to cross the river, We humans are so innocent that we accept everyone’s words very easily without any insight.

Till the last breath, see what the truth is, how it is, how it rises and how it goes. Have taken help without anyone without being influenced by some outside influence. Your own knowledge is illuminated like the sun. Wait for the same morning when the sun will be on its own and sit all night till the sun comes. In this night of ignorance, the eyelids of many are closed and the sun of supreme knowledge shines in those whose eyes are open.

କବିତା

ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ

କବିତା:
କେବେ ହିମଗିରି ହୋଇ ଛାତି ଚିରିଦିଏ
ଶୀତଳ ପବନେ ଭାସେ,
କେବେ ମରୁଭୂମିର ସେ ପ୍ରଖର ବତାସେ
ବାଲି ସାଜି ନେତ୍ରେ ପଶେ।


କବିତା:
କେବେ ଜୁଆର ସାଜି ସେ କୂଳ ଲଂଘିଯାଇ
ମୁରୁକି ମୁରୁକି ହଁସେ,
କେବେ ଭଟ୍ଟା ହୋଇ ସିଏ କୂଳଠୁ ଅଦୃଶ୍ୟ
କୂଳ ଏକୁଟିଆ ବସେ।

କବିତା:
କେବେ ଅଦିନିଆ ମେଘେ ଗରଜି ଗରଜି
ବରଷା ହୋଇ ସରସେ,
କେବେ ବସନ୍ତ ରଙ୍ଗରେ ରଂଗାୟିତ ହୋଇ
ଅପୂର୍ବ ସୁନ୍ଦରୀ ଦିଶେ।

କବିତା:
କେବେ ଗ୍ରୀଷ୍ମର ରୋୖଦ୍ରରେ ଶୁଷ୍କତାର ମାସେ
ଅଗ୍ନି ବରଷାଏ ଘାଶେ,
କେବେ ଆଶାଡ଼େ ବାଦଲ ନାଚି ନାଚି ଆସି
ବରଷି ଭୂମି ସୁଭାସେ।

କବିତା:
କେବେ ସଂସାର ଭିତରେ ମରୀଚିକା ହୋଇ
ସୁଖ-ଦୁଃଖ ସାଜି ବସେ,
କେବେ ସନ୍ୟାସିର ପଥେ ଈଶ୍ୱର ସନ୍ଧାନେ
ମୁକ୍ତି ପାଈଁ ପ୍ରୟାସେ।

କବିତା:
ସ୍ଥାନ, କାଳ, ପାତ୍ର କିଛି ନାହିଁ ମୋରୋ
କଲମ ମୁନେ ମୁଁ ଦିଶେ,
ମୋ ନାମ କବିତା ଭାବରୁ-ଭାବିତା
କବିଙ୍କ ହୃଦୟେ ମିଶେ।

ଢୀଙ୍କି

ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ

ଯେ ରାତି ନ ପାହୁଣୁ ଲୟେ ବଜୁଥିଲା
ଚୁଡ଼ା, ଛତୁଆ ରେ ଦିନ କାଟୁଥିଲା,
ନୃତ୍ୟର ତାଳରେ ନିତି ନାଚୁଥିଲା
ବେଲୟ ହୋଇଲେ ହାତେ ପିଟୁଥିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(

ଦ୍ବି-କୋଠା ଧାନରୁ କୋଠେ ରଖୁଥିଲା
ଦ୍ବି-ପ୍ରାଣୀଙ୍କର ଗପ ଶୁଣୁଥିଲା,
ଅଗରେ ଜଣିଏ ପଛରେ ଜଣିଏ
ନେଲାଵାଲା ଆସି ପାଖେ ବସୁଥିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(

ତାର ଶବଦରେ ଗ୍ରାମ କମ୍ପୁଥିଲା
ଢ଼ୀଙ୍କି ପିଟା ଲୋକ ନାମ ଗୁଁଜୁଥିଲା,
ଟଂକା ପଇସାର ବେପାର ନ ଥିଲ
ଅଦଳେ ବଦଳେ ସବୁ ଚାଲିଥିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(

ସମୟ ବ୍ୟସ୍ତତା ଏତେବି ନ ଥିଲା
ମନୁଷ୍ୟତା ଦେହେ ପ୍ରାଣ ସଂଚୁଥିଲା,
ମଣିଷ ସଙ୍ଗରେ ମଣିଷର ମେଳ
ଢ଼ୀଙ୍କିର ସଂଗତେ ନିତି ଝୁମୁଥିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(

ଢ଼ୀଙ୍କିର ସୁଆଦ ଜିହ୍ୱା ଲୋଭୁଥିଲା
ହୃଦୟ ତ୍ରୁପ୍ତିର ଗୀତ ଗାଉଥିଲା,
ଢ଼ୀଙ୍କି କୁଟା ବିରି,ଚାଉଳ,ଗହମେ
ପିଠା ଓ ମିଠାରେ ଗ୍ରାମ ବସୁଥିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(

ଢ଼ୀଙ୍କି ପଛ ଵାଲା ନିଦେ ଝୁଙ୍କୁଥିଲା
ଆଗଵାଲା ହାତେ ଦାନା ଟୁଙ୍କୁଥିଲା,
ମଣିଷ ମଣିଷ ବିବାଦ ନ ଥିଲ
ଢ଼ୀଙ୍କିର ସୁଅରେ ଜଗ ଭସୁଥିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(

ମାଟିର ମଣିଷ ଧୃତ-ଚାଲାକ ନଥିଲା
ଉଦାର ଚିତ୍ତରେ ଉଦାରିଆ ଥିଲା,
ରାଗ, ଦ୍ବେଶ, ହିଂସା ଯେତେ ରହିଲେବି
ଢ଼ୀଙ୍କିର ଶବଦ ସମତ୍ୱରେ ଥିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(

ପିଲାଦିନ ମୋର ଗ୍ରାମରେ କଟିଲା
ନୟନେ ଢ଼ୀଙ୍କିର ରୂପ ଉଭରିଲା,
କେତେଥର ମା ଧାନ କୋଠା ସହ
ଢ଼ୀଙ୍କି କୁଟିବାକୁ ମତେ ନେଉଥିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(

ଢ଼ୀଙ୍କିର କାଠକୁ ଉଈ ଖାଇଗଲା
ଯାହା ବଂଚିଥିଲା ଜାଳେଣି ସାଜିଲା,
ମେସିନ ଯୁଗରେ ମେସିନ ମଣିଷ
ମେସିନି ସାଙ୍ଗରେ ସଂସାର ତୋଳିଲା।
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା ଦିନ କାହିଁ ଗଲା….:(
ଆହାଃ ସେ କରୁଣା…:(((

ମୃତ୍ୟୁର ଚଡ଼କ

ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ

ମୃତ୍ୟୁର ଚଡ଼କ ଚମକ ଦେଲାଣି
କାଳ-ଗର୍ଭେ ଉଠି ଉଜାଣି,
ଅନ୍ତର-ନେତର ମୁଦିତ ହୋଇଛି
ବହିର୍ ଦୃଶେ ଆତ୍ମ-ଜୀବନୀ।
ମୃତ୍ୟୁର ଚଡ଼କ…

ଜନ୍ମ ପରେ ଜନ୍ମ ପୀଡ଼ିତ ଅତୃପ୍ତ
ଜୀବ-ଚକ୍ରୁ ମୁକ୍ତ ହେଉନି,
ଅନ୍ତ-ହନ୍ତସନ୍ତ ଦୁଃଖ ମରୁ-ପ୍ରାନ୍ତେ
ଭ୍ରମରେ ଭ୍ରମୁଛି ନିର୍ଗୁଣି।
ମୃତ୍ୟୁର ଚଡ଼କ….

ଧର୍ମ-ଗୁଣ-କର୍ମ ଆସିଥିଲେ ଘେନି 
ଶୈଶବରେ ଥିଲା ମଣି,
କିଶୋର ଦେହରେ ଶକ୍ତି ଅହଂକାରେ
ଅଧର୍ମରେ ହେଲେ ଅଜ୍ଞାନୀ।
ମୃତ୍ୟୁର ଚଡ଼କ….

କେତେ ଦିବା-ନିଶି ଦିଅଇ ଗଡ଼ଣି
ଜପି ଜପି ମୁକ୍ତି କାହାଣୀ,
ମୁକ୍ତି-ଧ୍ଵନି କର୍ଣ୍ଣ ଦ୍ୱାରଠୁଁ ଦୁରରେ
ମାୟାରେ ଝୁମୁଛି ଅଧ୍ୟାନୀ।
ମୃତ୍ୟୁର ଚଡ଼କ….

ଗତି-ମତି-ନିତ୍ୟେ ଧରି ରଖିବାର
ଛାଡିବା କଣ ଶିଖିନି,
ଲୋଭ,କ୍ରୋଧ,କାମ ଅନନ୍ତ ସୁଅରେ
ଜନ୍ମ-ଜାତକର ଜୀବନୀ।
ମୃତ୍ୟୁର ଚଡ଼କ ଚମକ ଦେଲାଣି
ମୃତ୍ୟୁର ଚଡ଼କ ଚମକ ଦେଲାଣି..

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି

~ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି ହିଂସାରେ,
ପରା-ଭାବ ପରା-ଅର୍ଥରେ,
ପର ଆପଣାର ବିଚାର କରି ମୁଁ
ନିଜେ ଜଳେ ନିଜ କୃତ୍ୟରେ।

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି କ୍ରୋଧରେ,
ଇଚ୍ଛା କାମନାର ଜ୍ବାଳାରେ,
ପୂରଣ ହେଉନି ଯାହା ମୁଁ ଚାହୁଁଛି
ଦେହ-ମନ ଜଳେ ଦ୍ବେଷରେ।

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି ପର ଚର୍ଚ୍ଚାରେ,
ମୋ ଠୁଁ ଉର୍ଦ୍ଧରେ କେହି ଯଦି ଧରେ
ତାର ନିମ୍ନଗାମୀ ବିଚାରେ,
ଜଳି ମାରୁଥାଏ ଅନ୍ତରେ।

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି ଲୋଭରେ,
ଯେତିକି ଅଛି ମୋ ପାଖରେ
ଲାଗିପଡ଼େ ଆଉ ଠାବରେ
ଜିହ୍ୱାର ଲାଳସା ମନର ଭୋକରେ,
ଜଳେ ଅସନ୍ତୋଷ ନିଆଁରେ।

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି ପ୍ରତିଷ୍ଠା ଆଳରେ,
ସୁନାମ ପାଈଁ ମୁଁ କର୍ମ କରିଚାଲେ
ପ୍ରମାଣ ଝିଲେ ମୋ ଗୃହରେ,
ଅହଂକାରେ ଜଳି ମରେ।

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି ମାୟାରେ
ପର କାୟାରେ
ପର-ନାରୀ ପର-ପୁରୁଷ ଦେଖିଲେ
କାମନା ରାଜ୍ୟେ ମୁଁ ବିଚରେ,
ମାୟାର ଅଗ୍ନିରେ ଉତ୍ତପ୍ତ ପିଣ୍ଡରେ
ଜଳି ମରେ ବ୍ୟଭିଚାରେ।

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି ଅଧର୍ମ ନିଆଁରେ,
ଧର୍ମ ଧର୍ମ ହୋଇ ମରେ ଜୀବଦେହି
ଜାତି ଭେଦ ନିର୍ଣ୍ଣୟରେ,
ମଣିଷ ଧର୍ମଟି ମଣିଷ ଭୁଲିଛି
ମୃତ୍ୟୁ ଧର୍ମୁ ଅପସରେ।

ଜଳି ଜଳି ଯେବେ ଶରୀର ନ ଥିବ
ଚିତା ଜଳୁଥିବ ମୃତ୍ୟୁ ଶେଯରେ,
ସବୁ ପାସରିବେ ସବୁ ଭୁଲିଜିବେ
ଯା ପାଈଁ ଚିନ୍ତୁଛି ନିତ୍ୟରେ।

କାଳ ବେଳ ଏଇ ଗଡ଼ି ଗଡ଼ି ଯାଏ
ଧର୍ମର ସୁରଜ ଉଈଁ ଉଈଁ ଯାଏ,
ଜୀବନ ସକାଳ ମୃତ୍ୟୁର ସଂଜରେ
ସବୁ ଜ୍ବାଳା ଲିଭେ ଅନ୍ଧକାରେ।

“ମୁଁ” ଜଳୁଛି କେଉଁ ଜ୍ବାଳାରେ ?
ନିଜକୁ ନିଜେ ହିଁ ପଚାରେ,
ଜଳୁଛି ଏତେ ମୁଁ ଗଭିରେ
ଦୃଷ୍ଟି ନ ପାଉଛି ଅନ୍ତରେ
ଆତ୍ମାଟି ଜୀବିତ ଏବେବି ଜଳିନି
ଛୁପିଅଛି ଅଦୃଶ୍ୟରେ।

ଜ୍ବଳନ୍ତ ଜୁଇରେ ହାତ ବାଜିଗଲେ
ଦେହ ମନ ଥରେ ଭୟରେ,
ଭିତରେ ଯେ ଜୁଇ ଜଳୁଛି ନିଇତି
ଧ୍ୟାନେ ଦେଖ ନୀରବରେ।
“ମୁଁ” ଜଳୁଛି କେଉଁ ଜ୍ବାଳା ରେ….

“I” AM BURNING

“I” am burning with violence,
with the sense of alienation and the wealth of others,
with the feeling of alienation and my own,
I am burning in my own actions.

“I” am burning with anger,
my body and mind are burning with hatred because of the non-fulfillment of my desire.

“I” am burning in the discussion of others, If someone is rising above me, then I have been thinking for his lower, And I burn with my inner fire.

“I” am burning with greed,
Not satisfied with what I have,
I am looking for more,
burning with the fire of dissatisfaction with the longing of the tongue and the hunger of the mind.

“I” do my work with a desire to get a good reputation and satisfy my ego and I have kept the certificate of good fortune hanging in my physical house.
And I am burning with ego.

“I” am burning with Maya and seeing other women and men from the bodies of others,
I burn with the flame of desire.
By burning my body with the fire of Maya,
I am burning with adultery.

“I” am burning with the fire of religion,
due to the difference of religion,
I divided man into human beings and forgot that death is the last religion.

When the body will no longer be burnt,
when I sleep on the bed of death by the fire of the pyre,
then all will be forgotten for whom I always worry.

The wheel of time goes on turning,
the sun of righteousness comes and goes, in the morning of life,
in the evening of death, all the flames will disappear into darkness.

What flame am I burning?
Let me see once from my own intuition,
“I” am burning so much from inside that my sight is not reaching there but the soul is still not burnt which is invisible from me.

When the hand is involved in the burning fire, then the whole body and mind trembles,
to see the fire which is burning from inside,
it needs silent and constant meditation.
Then you will know in which flame I am burning.

अगर आपने कुछ बड़ा किआ है!

जब आपको ऐसा लगे की अपने बहुत बड़ा काम किया, आपके जैसा किसीने नहीं किया, केवल आपको इस महान कार्य का श्रेय जाना चाहिये, आपको शाबाशी मिलनी चाहिए, अपने बहुत दान किया है और आपको उन दान का पुण्य मिलना चाहिए, आप एक महान दान-वीर हो, आप के कार्य को सराहना मिलना आवश्यक है, आप उन महान महानुभावों में से हैं जिन्होंने बहुत कुछ किया है, आपके कार्य तारीफों के मोहोताज़ है, आपके जैसा कोई नही, कोई नही, कोई नही! तो सिर्फ एक बार अपने हृदय को खोलो दीवारों से बहार निकाल कर आसमान के नीचे, नंगे पाओं दो कदम मिट्टी को छूते, नदी के किनारे उस विशाल जल समुद्र के पास बैठ देखो, उस विशाल आकाश को जिस तत्व ने अपने बक्ष पर वायु को समेटे हुए पूरी सृष्टि के जीवन का आधार हुआ पर अपने आपको कभी बड़ा नही कहा, अपने नंगे पैरों से एक बार उस मिट्टी पर चलो और महसूस करो तुम्हारे जैसे पूरे सृष्टि का वजन को सम्भले हुए इस मिट्टी को जिसने कभी तुमसे तारीफ एक कतरा भी नही माँगी, कुछ पल के लिए अपने अंग वस्त्र उतारों और सूरज की उस रौशनी को अपने अंग से छुओ जिसने अग्नि तत्व से सृष्टि को बचाया पर किसी की अच्छाई या बुराई से जला नहीं, नदी के किनारे देखो उस विशाल जल राशि को जो सबकी तृष्णा निवारण कर रही पर तुम उसकी तृष्णा निवारण कभी किए ही नही। देखो इस विशाल प्रकृति को जिसने तुम्हारी प्रकृति को बचाया पर तुमने अपनी प्रकृति को जाना ही नहीं। आकाश ने कभी यह नही सोचा की किसको मैं अपनी गोद में स्थान दूँ और किसको नही, वायु ने कभी नही देखा की किस दिशा बहना है और किस दिशा में नहीं, जल ने कभी यह नही सोचा किसकी प्यास बुझाऊँ और किसकी नही, मिट्टी ने कभी यह नही देखा की कौन मेरा सीना भेद कर इमारत बना रहा और कौन कुटिया, प्रकृति ने कभी यह नही सोचा की कौन उसकी प्रकृति को समझ पाएगा या नही। उनको अपने कार्य पर कोई अंहकार नहीं, जो सिर्फ अपने कर्म निर्द्वन्द, निस्वार्थ और निर्विकार भाव से कर रहें हैं।

दान तो उस पांच तत्व का आप पर है जो आपके स्थूल शरीर का कारण है। पर इन तत्वों को अपने दान पर कोई अभिमान नही। अगर आप कभी दान करते हैं तो शायद उस पर आपका निहित स्वार्थ भी रह सकता है, जैसे की पुण्य प्राप्त करने की अभिलाषा। दान के तीन पर्याय होते है, जैसे की “तुच्छिक दान” करना ऐसे दान जो आपके कुछ अनावश्यक वस्तु या धन जो आपके उपयोग में नही आता है उसको आप जब दान करते हैं। दूसरे में “बत्सल्य दान”, ऐसे दान में आपका जो है उसको अपने लिए बचाते हुए दूसरों को दान देना। तीसरे में “आत्मिक दान”, यह दान में दानी प्रकृति के बराबर है जो पंच तत्व से बना यह स्थूल शरीर भी दान स्वरूप दे देता है।

आत्मिक दान का एक सुन्दर व्याख्यान भगवान बुद्ध के समय दिया गया है:

एक बार मगध के राजा अजातशत्रु ने भगवान बुद्ध को धर्म प्रचार के लिए देश आमंत्रित किया। भगवान बुद्ध के आने की खबर सारे देश में फैल गई। यह खबर जंगल में निवास एक दंपति के पास भी पहुँची। यह पति पत्नी (दंपति) बहुत गरीब थे जिनके पास पहेनने के लिए एक ही जोड़ी कपड़े थे। अगर पत्नी को बहार जाना हो तो पति घर में निबस्त्र हो रहते थे और पति को बहार जाना हो तो पत्नी। बुद्ध के धर्म वाणी सुनने के लिए दोनों ही उत्सुक थे और संशय में भी। समस्या यह थी कि दोनों के पास एक जोड़ी कपड़े है जाए तो कौन जाए। दोनों ही अपने अभाबी जीवन को तिरस्कार कर दुःख और पीड़ा से जर्जरित थे। अंत में पतिब्रता पत्नी ने अपने पति को जाने की गुहार की और वे घर पर रही। पति बुद्ध के धर्म वाणी सुनने पहुँच धर्म की गहराई को सुनते सुनते ही समाधीवश हो गया। समाधी से जगते ही अपने अंतर से दान चेतना जागृत हुई तो अपने बस्त्र को दान देंगे यह निर्धारित किया। पर यह चेतना आते ही वो संशय में भी पड़ गया की अगर यह एक ही बस्त्र अगर वो दान कर देता है तो उनकी लज्जा निवारण कैसे होगा? फिर उनके विचारों में द्वन्द शुरू हुआ और कुछ देर ऐसे द्वन्द में रहे फिर अचानक वो धर्म सभा में खड़ा हो कर बोलने लगा की मैं जीत गया, मैं जीत गया!! और अपने बस्त्र दान देने के लिए उत्छुक हो आगे बढ़ ही रहे थे तो यह देखते ही भगवान बुद्ध को सारा बृतान्त पता चल गया और वह वस्त्र दान देने से पहले ही सारे बात अजातशत्रु को बता दी। अजातशत्रु ने उस भक्त को 32 जोड़ी कपड़े दान स्वरूप भेट दिए। पर दान धर्म की गहराई से परिचित हो व्यक्ति ने अपने लिए और पत्नी के लिए दो जोड़ी कपड़ा रख कर और सारे 30 कपड़े भगवान बुद्ध को दान स्वरूप भेट दिए। आत्मिक दान सदैब निस्वार्थपर और निर्विकार होता है यह उसका उत्कृष्ट उदहारण है।

इन दानीओं में से आप कौन से हैं? सोचिये और देखिये। कोई कोई दान किसको करें, क्या करें और कैसे करें ? यह सोचते सोचते अपने जीवन के अंतिम चरण में ही पहुँच जाते हैं। पर दान के धर्म को नहीं समझ पाते। उनको पात्र-अ-पात्र, दरिद्र-अदरिद्र, अच्छे-बुरे, शत्रु-मित्र, जैसी शंकाएं दान के पथ को अबरोध कर रखती है। जैसे प्रकृति ने दान करते वक़्त यह कुछ भी देखा नहीं सबके लिए करुणा और प्रेम से अपना मानकर गुण धर्म को दान दिया। आपको उनसे क्या सीखना चाहिए ? सोचिये और देखिये। बस देखो और सिखों। यहाँ कोई सिखाने वाला नहीं या कोई दिखने वाला नहीं, कोई सुनने और सुनाने वाला नहीं सिर्फ तुम ही तुम हो। और कितने दिन अपने पथ पर आप ही खड़े रहोगे। कभी भी अनंत निद्रा हो सकती है बस उस निद्रा में स्थूल शरीर का ही त्याग होगा पर आपका कर्म ही जीवित रहेगा। इस नाटक का अंत निस्वार्थ कर्म से हो जहाँ तुम और मैं कोई न हो सिर्फ धर्म ही धर्म हो।