तृप्त नहीं “मैं”

“I”Ego

तृप्त नहीं “मैं”
कर्म की यात्रा से
मुक्त नहीं “मैं”,
अहम घड़ी भर चुकी है,
फिर भी,
इच्छा, कामना से
ज्ञात नहीं “मैं”….
तृप्त नहीं “मैं”…..।।

गुप्त है
पर लुप्त नहीं “मैं”
सुषुप्त चित्त में
शक्त रहा “मैं”
व्यक्तित्व के वस्त्र में
व्यक्ति है,
तत्व नहीं “मैं”….।।

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