~मुकुंद देव साहू
मैं मुक्त हूँ माया से
मेरी प्रतिबिम्ब प्रति-छाया से…।।
मैं मुक्त हूँ
“मैं” की काया से
“मैं” प्रबल नव दुनियाँ से…।।
“मैं” एक प्रश्न हूँ
मेरे सामने ही खड़ा हूँ,
उत्तरों की बेड़ियों से
निरुत्तर हो लड़ा हूँ,
“मैं” कोई नहीं कुछ नहीं
उस पद में चल पड़ा हूँ,
उसी मार्ग में मार्गी हूँ
अदृश्य दृश्य से जुड़ा हूँ…।।

Soulfully described
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