The Journey of the Guru and the Disciple
गुरुपूर्णिमा विशेष लेख: मुकुंद देव साहू

जीवन में गुरु की आवश्यकता हर किसी को होती है। यह एक शाश्वत सत्य है कि बिना गुरु के कोई भी व्यक्ति सत्पथ पर चलकर आत्मज्ञान या परम सत्य के आलोक को नहीं देख सकता।
गुरु केवल पथ प्रदर्शक नहीं होते वे स्वयं वह दीपक होते हैं, जिसकी रोशनी में साधक अपने भीतर के अंधकार को पहचानता है और उससे बाहर निकलने की यात्रा शुरू करता है।
आज के समाज में ‘ज्ञानी’ कहलाने की परिभाषा थोड़ी बदल गई है। ज्ञान का अर्थ अक्सर केवल तथ्यों और सूचनाओं का संग्रह मान लिया गया है। जो व्यक्ति उन्हें चतुराई से प्रस्तुत कर लेता है, उसे ही ‘ज्ञानी’ कहा जाता है।
पर क्या वास्तव में वह व्यक्ति ज्ञानी है? या वह केवल चतुर है?
गुरुपूर्णिमा के इस पावन अवसर पर आइए, इस भेद की थोड़ी खोज करें।
गुरुपूर्णिमा का दिन वही पुण्य तिथि है जब भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश धर्मचक्र प्रवर्तन पाँच शिष्यों को दिया था। यह केवल एक शिक्षण घटना नहीं थी, बल्कि आत्मज्ञान की एक वैश्विक धारा की शुरुआत थी।

बुद्ध की एक कथा है, वे एक मुनि से बहती नदी के किनारे संवाद करते हैं।
बुद्ध पूछते हैं, “यदि कोई इस नदी के दूसरे किनारे जाना चाहे तो क्या करेगा?”
मुनि उत्तर देते हैं, “यदि जल कम हो तो वह पैदल पार कर सकता है; यदि गहरा हो, तो नाव का सहारा लेगा; और यदि तैरना आता हो तो स्वयं तैर सकता है।”
बुद्ध फिर प्रश्न करते हैं, “यदि वह न चलना चाहे, न तैरना, न नाव लेना, और यह कहे कि ‘नदी का दूसरा किनारा स्वयं चलकर मेरे पास आ जाए’ तो आप क्या कहेंगे?”
मुनि उत्तर देते हैं, “ऐसे व्यक्ति को हम मूर्ख ही कहेंगे।”
बुद्ध समझाते हैं, “जो व्यक्ति स्वयं के अज्ञान और भ्रांति को दूर नहीं करता, वह भी उसी प्रकार मुक्ति के दूसरे छोर तक नहीं पहुँच सकता। चाहे वह पूजा करे, अनुष्ठान करे, व्रत रखे या नैतिक जीवन जिए वह केवल भ्रम के साथ उसी किनारे पर खड़ा रहेगा।”
गुरु का कार्य: दिशा देना, नाव नहीं बनाना
मनुष्य को यह दुर्लभ जीवन परम सत्य की खोज के लिए मिला है। और इस सत्य तक पहुँचने के लिए गुरु की आवश्यकता अनिवार्य है। गुरु मार्ग दिखाते हैं, पर चलना तो स्वयं को ही होता है।
गुरु की दृष्टि में सभी शिष्य समान होते हैं वह न जाति देखता है, न पद, न धन, न विद्या।
शिष्य को यह निर्णय स्वयं करना होता है कि वह उस मार्ग को कैसे पार करेगा किसी की बनाई नाव से या अपनी नाव बनाकर।यह निर्णय उसके प्रारब्ध, संकल्प, और कर्मों पर आधारित होता है।
कलाकार की दो यात्राएँ: परफ़ॉर्मर और गुरु
कलाकार दो प्रकार के हो सकते हैं, एक परफ़ॉर्मर, दूसरा गुरु।
दोनों एक ही गुरु से शिक्षा पाकर भी अलग-अलग दिशाओं में यात्रा करते हैं।
परफ़ॉर्मर अक्सर दूसरों की बनाई नाव में यात्रा करता है। उसे मंच, आयोजक, दर्शक, और प्रशंसा की आवश्यकता होती है।
वह भी किनारे तक पहुँच सकता है, पर उसका अनुभव मुख्यतः बाह्य होता है।
गुरु, अपनी नाव स्वयं बनाता है, स्वयं ही उसका नाविक बनता है।
वह अकेले उस गहरे जल को पार करता है, और जब पहुँचता है, तब दूसरों को भी मार्ग दिखाने लगता है, अपनी नाव से, अपने अनुभव से।
दोनों ही दूसरे किनारे तक पहुँच सकते हैं, लेकिन क्या दोनों की यात्रा की गहराई, भक्ति, त्याग और अनुभूति समान होती है?
क्या मुक्ति की अनुभूति सबके लिए एक जैसी होती है? यह प्रश्न आज भी हमारे भीतर उत्तर की प्रतीक्षा में है। गुरुपूर्णिमा के इस पावन अवसर पर आप सभी को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ। स्वस्थ रहें, साधना में रमें, और स्वयं अपना दीपक बनें।
“तमसो मा ज्योतिर्गमय।”
(अंधकार से प्रकाश की ओर चलो।)

