ଅଳପରେ ଗଳପ

ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ ସାହୁ

ଅଳପ ରେ ଗଳପ କାହିଁ ଏତେ ବିଳାପ
ଦେଖ କରି ସ୍ଵଳପ ଜୀବନର ମିଳାପ…!!

ଜୀବନ ତ ଧାଇଁନି କାହା ବାଟ ଚାହିଁନି
ନିରନ୍ତର ଚାଲିଛି କାହା ପାଈଁ ରହିନି…!!

ଏ ଜୀବନ ଧରମ କରୁଅଛି କରମ
ମୃତୁ ପରେ ଜନମ ଜୀବନର ମରମ….!!

ଜୀବନରେ ମନଟା ସ୍ୱାଭିମାନ ଧନ ଟା
ବିବେକକୁ ଭୁଲିଛି କାଟୁଅଛି ଦିନଟା…!!

ମନର ଯେ ପ୍ରଭାବ ଜାଣିବାଟା ଦୁର୍ଲଭ
ରାଗ, ଦ୍ବେସ, ଦୁଃଖରେ ଶାନ୍ତ ତାର ସ୍ଵଭାଵ…!!

ମନକୁ ଯେ ଜାଣିଛି ଜୀବନକୁ ଯିଣିଛି
ମନ ନିରବତାରେ ଈଶ୍ୱରଙ୍କୁ ଦେଖିଛି….!!

ଗଳପର ସମାପ୍ତି ମନଯୋଗେ ମିଳନ୍ତି
ଜୀବନର ଆନନ୍ଦ ଅନୁଭବ କରନ୍ତି…!!

मैंने देखा पृथ्वी को

मैंने देखा पृथ्वी को घूमते हुए
अपने ही उन्माद में पल पल झूमते हुए,
बादलों का बस्त्र पहने
अपने आपको सजते हुए..
मैंने देखा पृथ्वी को….

मैंने दिखा उसके बिशाल रूप को
अपनी दृष्टि को फैलाते हुए,
बादलों की खूबसूरती
सूरज की रौशनी से बदलते हुए…
मैंने देखा पृथ्वी को….

मैंने देखा
रात के अंधेरों में
उसको बात करते हुए,
चाँद तारों को
अपने करीब बुलाते हुए…
मैंने देखा पृथ्वी को….

बोल रहा था उनको
क्या आप सब मुझे अंदर से देख पाते हो…?
जीवन की अनंत यात्रा को
अपने हृदय में लिए चल पते हो…?
मेरे हृदय में बहुत कुछ बसा है,
क्या तुम्हें पता है,
क्या उनकी दशा है…?
उत्तर में वो बोल रहे हैं
तुम्हारा हृदय दूर दूर तक फैला है
जहाँ जीवन का एक अनंत मेला है…।
हम तो तुमसे दूर है,
न हम में जीवन है
न न होने का बिषाद है…।
खुश हैं,
हम तुम्हें ऐसे देखते हुए,
तुम गति को
कही और किसी के लिए न रुकाते हुए,
चलते चलो तुम
हम तुम्हारे साथ हैं…।

सुना मैंने उनको बात करते हुए,
आज देखा मैंने
पृथिवि को घूमते हुए….।

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बस चल रहा है

न तेरा है न मेरा है
फिर भी ख़रीददारी चल रही है,
न तेरा है न मेरा है
फिर भी धोखादारी चल रही है,
न तेरा है न मेरा है
फिर भी मारा-मारी चल रही है…

बस चल रहा है,
जीवन का यह निर्बाह
न है संवाद
न है कोई उत्साह,
न सत्य से पहचान
न कोई खोज,
घट रही वही कहानी
हर रोज…

बस चल रहा है,
जीवन का एक झूठा नाटक,
किसी के झुठेपन से
खुल और बंद हो रहा
जीवन का अनखुला फाटक…

बस चल रहा है,
किसीने कुछ कहा
बिन सुने उसको सुना
बिन देखे उसको देखा,
खुद को उनमें समाया
और खुद को खुद से ही रोका….

बस चल रहा है,
नित्य कर्म
जो अनित्य से जुड़ा है,
कितनों की ख़ुशी के लिए
खुद-को कहीं दूर छोड़ा है….

बस चल रहा है
जीवन की नॉका मैं
शारीर सबार है,
किनारे से निकले थे
किनारे की तलाश है,
बस चल रहा है…

सोचा था
सागर बहुत छोटा है,
वही तक फैला है
जहाँ बादल झुका है,
जितने भी करीब आऊ
वो बैसे दीखता है,
मेरे नज़र के साथ
ये कैसी धोखा है,
बस चल रहा है….

क्या पता यह शरीर
कब मुझसे नाता तोड़ दे,
बस तोड़ने से पहले
अपने आप से नाता जोड़ दे,
ढूंढ लूँ अपने आपको आप में
फिर सभी से नाता तोड़ दे
फिर सभी से….

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मन

मन में
विचारों की माला
भबनाओं से गुंथ
अपनी चेतना खोई,
चेत से अचेत होये में
दिवस निशि रोई…।

शांत मन
है तपोवन
काहे कैलाश होई,
समय से जाग
छोड़ अनुराग
काहे रहत सोई।

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काया का दर्पण

बस एक कंपन ही है
इसीसे काया सम्पन ही है,
मन न करो, मन से करो
मन काया का दर्पण ही है।

काया पर किसीकी छाया है
कण कण में समाया है,
क्या है? क्यों है ? कहा है?
देखो!
क्यूं के, मन काया का दर्पण ही है।

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ये तो होना ही था

यह तो होना ही था,
कितने दिन छुपोगे
भाग कर भी कहाँ जाओगे
प्रकृति के प्रकोप से
आधुनिक विज्ञान का
लाचार, बेबस, उदासीनता को
महसूस करना ही था
यह तो एक दिन होना ही था….।।

यह तो होना ही था,
तुम्हारे बुरे कर्मों का
पिछले जन्मों का नही
बीते हुए कल का,
अर्थ के पीछे निर्रथकता का,
मानव होकर मानवता से अंजान
विज्ञान के अहंकार से स्वयं को महान,
आज उसी विज्ञान से
विनाश का तांडव देखना ही था,
यह तो एक दिन होना ही था..।।

यह तो होना ही था,
तुमने प्रकृति से सबकुछ लिया
ले ले कर स्वार्थी प्रमाण दिया,
तुमने जो दिया
प्रकृति को लौटाना हीं था
यह तो एक दिन होना था….।।

यह तो होना ही था,
दर दर से ठोकर खानी ही थी,
डर डर के जी ही रहे थे
अब डर को करीब से देखना ही था,
यह तो एक दिन होना ही था…
यह तो एक दिन होना ही था…।।
~मुकुंद देव

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~दान~

कर दान गुनी को
गुनी गुन जानी को,
गुन का मान रखिए
पूजन कर मुनी को ॥

गुनी गुन दाता है,
मुनी समान आता है,
ना करो मान गुनी की
ज्ञान चला जाता है ॥

~मुकुंद देव

२७/१२/२०२० 09:59PM

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ढलता हुआ सूरज

ढलता हुआ सूरज बहुत जल्दी ढलता है,
उसका सफ़र आपको न मुझे पता है।
कारनामा सुराजका
ढालने के बाद पता चलता है।
ढलता हुआ सूरज……!!

सुबह से सफर शुरू हुआ था
पता नहीँ वो शुबह कौनसा था,
घड़ी घड़ी सबको रोशन किया था,
अँधेरों का अनदेखा साया
उजालों की लोरी सुनाता हैं।
ढलता हुआ सूरज…..!!
~मुकुंद देव
१०/१२/२०१९ १६:३६PM