छोटे गुरूजी

खुद को उन्होंने हम सब में समां दिया
वो तप में रमें थे
हम सब को जप में
रमा दिया ।
खुद को उन्होंने…….।।

बोहत कुछ उन्होंने देखा और लिखा भी
जाते समय पूर्णच्छेद नेही
कमा दे दिया,
खुद को उन्होंने….।।

सबने कुछ नेही बहुत कुछ खोया
उन्होंने बहुतों में
सब लुटा दिया ।
खुद को उन्होंने….।।

उन्होंने हमे रोशन किया
हम अँधेरे में थे
ज्ञानमय प्रदीप जलाया
ज्योत से ज्योत को जलना सिखाया।
खुद को उन्होंने…..।।

12:19pm 13/11/2019
मुकुंद देव

आभाव से भाव

अभाव से भाव जात
भाव से जात भव,
भवसागर अपार होतो
पार न पावे सब…

भाव में आभाव से
रंजित हो स्व-भाव,
स्वा-भाव ज्ञान अज्ञान में
पुलकित हो भव…
~मुकुंद देव (२८-०९-2२०१९, प्रातः ७:४१)

बाबूजी के आखरी वक़्त

उस अनन्त यात्रा के आखरी वक़्त पर मुझे उनके चरण सेवा का अवसर मिला। उनके पद स्पर्श करते ही उनकी ऊर्जा का किंचित आभास हुआ और उनकी आँखें जब मुझ पर पड़ी सर हिलाते हुए कुछ इशारा कर रहें थे, शायद हर बार की तरह जीवन दर्शन के तत्व समझाना चाहते थे। जिन तत्वों के कारण मुझमें परिवर्तन का एक सुधारा बह रहा हैं। जिन तत्वों को समझना और समझाना सबके बस की बात नहीं उन तत्वों को बाबूजी बखुबी समझा देते थे। कुछ देर तक मैं उनके पैरों के पॉइंट्स दबाते रहा हर बार की तरह उनसे प्रतिक्रिया की उपेक्षा थी मुझे पर उनके मौन रहना मेरा हृदय में क्रन्दन की भावनाओं को जागृत कर रहा था। करीब 15 से 20 मिनिट तक मैं उनको स्पर्श करता रहा उनकी साँस लेने की तकलीफ को देख पॉइंट्स दवाना बंद कर दिया। परिवार के हर एक सदस्य के चेहरे पर उदासीनता और आँखों से आंसुओं की गंगा बह रही थी, सबके मुखसे क्षमा याचना के सुर गूंज रहे थे और बाबूजी आशीर्वाद की धारा बहा कर अनंत यात्रा के लिए चल बसे।

स्वर में जब समायो

बेजान में जान आयो
सुरों से जब रमायो
आलाप न तान
एक में सब समायो।।

इच्छा अनिच्छा
कछु न आई,
अहम् नाद
स्वहम् गायो,
अनंत नादे
निरन्त आयो।।
~मुकुंद देव २२/०८/२०१९

ବ୍ୟଙ୍ଗ କଟାକ୍ଷ

ଯେବେ ନିଜେ ଚୌକିଦାର ହୋଇବେ
ଚୋରକୁ, ପକେଇ ଉଠେଇ ଥୋଇବେ!!

ଯଦି ଅନ୍ୟକୁ ବାଟ ଚାହିଁବେ
ଅନ୍ୟେ, ସବୁକିଛି ତୁମ ଲୁଟିବେ!!

ଚୋର ଆଜି ନାହିଁ ଗୋଚରେ
ରହିଛି ଆମରି ଭିତରେ,
ଧରିବା ଜାଲତ ପଡ଼ିଛି
କିନ୍ତୁ, ଧରା ପଡ଼ିବନି ହାତରେ!!

ନିତି ଅନିତି ର ନିକିତୀ
ଚୋର ହାତେ ଯିଏ ଦିଅନ୍ତି,
ଅନ୍ୟ କେହି ନୁହେଁ
ଆମେ ପରା ସିଏ,
ନିଜକୁ ନିଜେ ଯେ ବିକନ୍ତି!!
~◆~
ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ ସାହୁ
୨୩:୧୨PM
୦୯-୦୩-୨୦୧୯

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ମୋ ଚିନ୍ତନରେ…

ମୋ ଚିନ୍ତନରେ ତୁମରି ଭାବନା

ଅବଂଛିତ ମନେ ସ୍ନେହର କାମନା,

ବାସନା ବାସ୍ନାରେ ପୁଲକିତ ମନା

କଉଁଠି କେମିତି ମନୁ ମୋ ବିନା ।।

ମୋ ଚିନ୍ତନରେ…

କାମନା ରାଜ୍ୟର ଉତ୍-କ୍ଷିପ୍ତ କମିନୀ

ଏକକ ଶଯ୍ୟାରେ ସ୍ବପ୍ନ ସଯ୍ୟାୟିନି

ସ୍ପର୍ଶା-ଲିଙ୍ଗନର ଉଚ୍ଚା ଭିଳାଷିନି,

ଦୃଶ୍ୟର ଅପଥେ ଅଦୃଶ୍ୟର ତଟେ

ମତେ ଛାଡ଼ି ଆଉ ରୁହନା ।।

ମୋ ଚିନ୍ତନରେ…..

ଉତ୍ତେଜିତ ପ୍ରଣେ ଅସଂଖ୍ୟ ପ୍ରଶ୍ନେ

ସ୍ପର୍ଶ କରିବିନି ପାଖକୁ ଯିବିନି

ଏକା ବଂଚିଯିବି କହେ ମନେ ମନେ,

ନିଷ୍ଟୁର ସାଧନେ ଅଦୃଶ୍ୟ ଦର୍ଶନେ

ମୋତେ ବିଚଳିତ କରନା ।।

ମୋ ଚିନ୍ତନରେ…..

ପୁର୍ବ ସ୍ମୃତି ସବୁ ଅଜାଡ଼ି ଦେଖୁଛି

ଉପସ୍ଥିତି ତୁମ ହୃଦ ବିଦାରିଛି,

ମନ ମନୁ ମୋରୋ ତୁମେ ସବୁକିଛି,

ତୁମ ଅମୁଲ୍ୟ ରତନ ଯତ୍ନରେ ବଢୁଛି,

ତା ପାଈଁ ବିଚଳ ହୁଅନା।।

ମୋ ଚିନ୍ତନରେ….

୧୦-୧୦-୨୦୧୮

ମୁକୁନ୍ଦ ଦେବ

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बंदिश

स्थाई:

सेज बिछाऊ फूलेवन में
पी के दरस लागी,
पी गयो कबसो ना आयो
दीन रात हूं जागी ।।

अंतरा:

तड़प तड़प जोबन जात है
नैनन में नीर ,नित बहत
रुठो ना मोसो अनुरागी ।।

२२/१०/२०१८

राग गावति

मोरे अवगुण ना धरो गुण के ज्ञानी
मैं अज्ञानी सुरताल कछु न जानि ….।

गुन के मुरत गुरुमुख सूरत
दया करो मोपे तुम हो महाज्ञानी….।।

गुरुकृपा
०५/११/२०१८
~मुकुन्द देव
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